ख्वाबगाह

ख्वाब्गाहो पर आज आखिरी बार गया

मासूमो के माथे पर चिंता कि लकीरे बता रही थी, उनके बिखरते सोच कि सीमाए बता रही थी

रास्तो पे उगे, घासो के अनेक प्रकार

तोपों पर चढ़े लताओं के घन

जगहों के बदले हुए नाम

बयाँ कर रहे थे

चौराहे पर घटी हर दुर्घटना को, क्रमशः

बता रहे थे ;

चीख और जांबाज़ी के किस्से बता रहे थे

जो पारित करते थे आखिरी इश्क़ के किस्सों को

जिसमे जला दिए गए थे, फरेब से सराबोर वो सरे वस्त्र, जो अब संजोए जा रहे है

शायद सेना के लिए

जो इस बार किसी के बुलावे पर नहीं खड़ी थी

शायद दम्भ बोल रहा था, ज्ञान नहीं

या नौकरशाहों कि ये कोई नई चाल थी ;

ख्वाब्गाहो पर आज आखिरी बार गया

विलुप्त होते ख्वाबो के सौंदर्य बता रहे थे

—– हर्ष तिवारी

आइना

वक़्त आइना उछालता है,

दिखाता है हर पत्थर कि लकीर को

उसे किसी नाज़ुक डोर ने बनाया है

दिखाता है हवाओ को, उनके पुराने रास्ते

मौत कि ठंडी वादियों को, हर्षोल्लास के दिन ;

ये आइना बहुत कुछ दिखाता है

इतिहास भी, कभी कभी चेहरा भी

जो देखते ही दिख जाता है उद्योगों का लेप

शायद चन्दन अब खुशबूदार नहीं, क्या पता उद्योग हो !

यूँ तो ये लोग पत्थर में भी जीवन डाल दे

पर ये आइना इंसानो को भी जीवीत दिखाता है

—- हर्ष तिवारी

ठहरो

कुछ देर और ठहरो

इस मद्धम हवा को, इसके साथ आती बरसात कि बूंदो को

स्पर्श करने दो, अपने चेहरे के हर भाव

साथ ही सोंधी मिट्टी कि उस गंध से

परिपूर्ण करो अपने मन को ;

इस मर्म निर्जीव रात में, जब इन घटियो पे बिजलिया गिरती है

मै प्रकाश से परिपूर्ण सिर्फ तुम्हे और तुम्हारे भावो को देखता हू,

जो मुझे स्पर्श करने से पहले ही विलीन हो जाते है, उस शुन्य में

जहा ये प्रकाश जाकर ठहरता है ;

लेकिन इन बूंदो कि ही तरह

मै भी बहता रहा हु, तुम्हारे हर भाव कि धुरी पर ;

इस मिट्टी सा हाल इंसानी रूप का

कभी सुन्दर, कभी कीचड़

पर तुम मुझमे इसकी सौंधी खुशबु कि तरह

मानवीय सुंदरताओं से परे,

उस प्रकाश कि भांति सजीव

और उस शुन्य तक रहोगी ;

—– हर्ष तिवारी

अनंत

चांदनी में नहाती सारी धुनें

अनंत तक सौंदर्य बिखेरती थी

उस एक रस शब्द का ;

उस शब्द का प्रभाव एक सामान, हर दरवाजे पर दस्तक देता, हर मन को टटोलता

विलीन हो जाता था उसी अनंत में ;

रात को बरसी चांदनी का रस, टपकता रहता था हर पत्ते से अनंत तक ;

अनंत अनहद में सीमाए बनाते

कई उम्र, कई रूप, कई चित्र, कई आलिंगन छूट गए, छूट गई रस से सराबोर कई कहानिया

जैसे छूट जाता है, एक बच्चे का खिलौना

अनंत सीमाओं को छूटे भविष्य में

—– हर्ष तिवारी

बरसात

निकलो अपने घर आँगन से

बरसात में, भींगने दो सारी उम्मीदे

गाओ वो सरे गीत, जो कभी फुर्सत में सुने थे

भूल जाओ कुछ पल के लिए, ये सारा समाज

सारी भविष्य कि चिंताओं को, पढ़े लिखो के व्याख्यानों को

फिर देखो अपने भीतर के सारे इंसानो को

जगाओ वो सारी चेतनाए

जो दबाई थी, समाज और ज़िम्मेदारियों के तले

फिर सोचो कि, तुम क्या हो

—– हर्ष तिवारी

खुशबु

बादल घने बहुत थे
खड़ी दोपहरी में रात सा अँधेरा था
सूख चुके पेड़ भी हरे थे
छत पर सूखी सफ़ेद चादर भी, बारिश की पहली बूंदो से मैली थी
हवा में एक अनंत बह रही खुशबु थी
एक आहात स्वर था
कुछ अन्याय सहे आंसुओ की नमी थी
मै नहीं था, दूर दूर तक उसके खयालो में बस मेरी कल्पना थी ;
धर्म की कुछ बेड़िया थी, भीड़ थी
एक बूढ़े की काँपति आवाज़ थी
मै नहीं था, एक घनघोर बरसात थी
और हवा में उन आसुओ की नमी थी
अब उस खून की गर्माहट भी ;
आज मिट्टी कि सौंधी खुशबु अलग थी
उसमे भी कुछ कसमसाहट थी
शायद अपना धर्म सोच रही थी ;
बादल और घने हुए, अँधेरा गहराया, बातसत और घनी हुई
वहां मिट्टी थी, हवा भी
मै नहीं था, मेरा धर्म था
—— हर्ष तिवारी

याद

भोर में को कोहरे से रिसता

बीते दिन का हिसाब, क्रमशः

एक कोयल की आवाज में सुना

बीते दिन, एक अरसा बीता था उसकी याद में

भोर, उस कोयल से सुना था

की वो याद खूबसूरत है ;

जो मेरे ग्लोब पे टहलती

ज़ज़र इंसानियत को टटोलती थी,

वो नही, जो धर्मांधो को राजनीति से जोड़ने की प्रसंगिकता पर सवाल करती थी

—– हर्ष तिवारी

न्याय

उस जली ठूंठ से मेरा क्या वास्ता

अनंत तक सुनाई देती वो आर्त ध्वनि, मुझे क्यों विचलित करती है

क्या ये हवा खुद को बाँट सकी है आज तक ?

जेलों में लाठियों और इलेक्ट्रिक शौको से लिखी गई कहानिया, क्या थी ?

क्या वह सही थी ?

सही क्या है ?

कानून की किताब में लिखा अन्याय कब सही होता है ?

क्या न्याय ना दे सकने वाले कानून

अन्याय की रक्षा करते वक़्त सही होते है ?

चमड़े के जूतों, मवेशियों, प्रार्थना स्थलों पे हक़ किसका है ?

ट्रैन में, सड़क पर, गलियों में, आँगन में

भीड़ का शिकार हुए

क्या तुम्हारे किताबी न्याय के हक़दार नहीं !

——- हर्ष तिवारी

भोर

भोर, वो हवा लाई थी अपने साथ, सारे जीवन का सजीव चित्रण

जो, उन सूखे कपड़ो में से छुटी, कुछ ओस से भीगी कमिज़ो पर, लिखती थी अपना इतिहास

सूरज हरी छन्नियो से झांकता पुख्ता कर देता था कुछ पन्ने, उस गीली स्याही को सुखा

बाकि इतिहास उड़ जाता था, प्रेस होने के बाद

कुछ बचे हुए शब्द, दिनभर चिल्लाते थे

अपना इतिहास, उस बूढ़े की देह पर ;

मनो कोई किसान पंचो से कह रहा हो

” ज़मीन मेरी अपनी है ”

—— हर्ष तिवारी

राख

एक दबी आहट, सुगबुगाहट

दिल तेजी से धड़कता था ;

आग, आग, जली ठूठ

क्या जली ठूठ पे घोसला बनाया है कभी ?

दिल, आग, जली ठूठ, क्या है ये सब ?

अकेले ही हो, की और कोई भी है

हाथ में राख रख दी उसने ;

थोड़ा पीछे हटा, फिर चला गया

मै सही से देख नहीं पाया, कौन था

मज़हब क्या था उसका ;

मगर राख की गंध साफ बयां कर रही थी

की ठूंठ पे घोसला तो बना है

—— हर्ष तिवारी

इन्सानियत


एक बडी बारीक, सुन्दर, चीत्कारों से अटि पड़ी इंसानियत

एक ख्वाब उसमे दाखिल होता है ; सारे भाव भंगिमाओ को एक सीरे से पिरोता

इस खोखले वजूद में घुसता है

खून और मांस के लोथड़ो से अटि पड़ी , ये लो एक और प्रतिमा

चाँद, फूल, नदी में प्रतिबिम्ब देखकर थक गए होगे

कई कवियों की वेदना पे हस लिए होगे

लो, आज एक और वेदना, प्रेम और इज़हार पर हस लो ;

इतना हसो, की कोई निगाह भर देखे

तो उसे लगे की तुम हसमुख हो

उसे लगे की समाज की गन्दी नाली में बहे खून को सीवेज की तरह ट्रीट करना सभ्यता है

—- हर्ष तिवारी

Seared feeling

An old seared feeling

It kills me every day in dawn, and builds me up in the night

It rains in my future, it floods down my memory lane

With that dart street, parable night;

I was there on apogee of emotions ; they were sagacious in asserting my problems not worth pondering

But my eyes and soul, they have seen ,they have felt her , and again with a smorgasbord of thoughts

I pondered whole night on the sand beneath the sky

I had my answers written on sand grains and on the air with mist

— By Harsh Tiwari

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